-अलविदा नाना – भावांजलि! विनम्र श्रद्धांजलि!
-एक युग का अवसान, भारत ने खोया भारतीय सिनेमा का एक विलक्षण कलाकार

ऋषिकेश। भारतीय सिनेमा के महान अभिनेता, संवेदनशील व्यक्तित्व और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखने वाले नाना पाटेकर जी के निधन से देश ने एक विलक्षण कलाकार को खो दिया है। उनके निधन का समाचार कला-जगत के साथ-साथ हम सभी के लिए अत्यंत पीड़ादायक है, जिन्होंने उनके अभिनय, व्यक्तित्व और मानवीय संवेदनाओं को निकट से अनुभव किया।

परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि आज व्यथित हृदय से प्रिय नाना पाटेकर जी को परमार्थ निकेतन से भावांजलि एवं विनम्र श्रद्धांजलि। माँ गंगा के पावन तट पर उनके साथ बिताए आत्मीय क्षण आज स्मृतियों में और भी जीवंत हो उठे हैं। उनका सहज अपनापन, सरल व्यवहार और बिना किसी आडंबर के दिल से जुड़ जाने वाली आत्मीयता सदैव जीवंत रहेगी।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि आज भारत ने एक ऐसे विलक्षण कलाकार को खोया है, जिन्होंने अभिनय को केवल निभाया नहीं, बल्कि उसे जिया। पाँच दशकों से अधिक की उनकी अभिनय-यात्रा में उन्होंने विविध प्रकार के चरित्रों को पर्दे पर साकार किया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि अभिनय करते हुए वे स्वयं पीछे हो जाते थे और चरित्र पूरी जीवंतता के साथ सामने आ जाता था।उनकी आवाज में प्रभाव था, संवादों में गहराई थी और उनकी आँखों की भाषा बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाती थी। उनकी सहज अभिनय-शैली ने उन्हें भारतीय सिनेमा में एक ऐसी विशिष्ट पहचान दी, जिसकी अपनी कोई दूसरी मिसाल नहीं हो सकती।

नाना पाटेकर जी की कला केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं थी। उनके अनेक किरदारों में समाज की सच्चाई, मानवीय संघर्ष, रिश्तों की जटिलता और जीवन की कठोर वास्तविकताएँ दिखाई देती थीं। उन्होंने अपने अभिनय के माध्यम से दर्शकों को केवल हँसाया या रुलाया नहीं, बल्कि उन्हें सोचने, प्रश्न करने और अपने आसपास की दुनिया को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए भी प्रेरित किया। यही किसी महान कलाकार की सबसे बड़ी शक्ति होती है कि उनका काम पर्दे से बाहर निकलकर समाज के मन को स्पर्श करे।

नाना जी की पहचान केवल उनके अभिनय तक सीमित नहीं थी। वे भीतर से अत्यंत संवेदनशील और अपनी जड़ों से जुड़े हुए इंसान थे। उन्होंने अपने जीवन में प्रसिद्धि को कभी मानवीय सरोकारों से ऊपर नहीं रखा। नाम फाउंडेशन के माध्यम से सूखे से जूझ रहे किसान परिवारों की सहायता और उनके जीवन में आशा का संचार करने का कार्य हो या देश की सीमाओं पर जाकर हमारे वीर जवानों के बीच खड़े होकर उनका मनोबल बढ़ाना, उन्होंने अपने सामाजिक दायित्वों को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि सेवा कार्यों के माध्यम से अभिव्यक्त किया।

उनकी संवेदनशीलता का दायरा व्यापक था। वे उन लोगों की पीड़ा को समझते थे, जिनकी आवाज अक्सर समाज के शोर में दब जाती है। यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व केवल एक सफल अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक के रूप में भी सम्मानित रहा। ख्याति के शिखर पर पहुँचने के बाद भी उनका अपनी मिट्टी, अपने लोगों और अपनी वास्तविकताओं से जुड़ाव बना रहा।

परमार्थ निकेतन के साथ उनका आत्मीय संबंध भी हमारी स्मृतियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनका परमार्थ निकेतन आना, माँ गंगा की आरती में सहभागी बनना और गंगा तट पर आत्मीय क्षण बिताना परमार्थ परिवार के लिए विशेष और अविस्मरणीय स्मृतियाँ हैं। माँ गंगा की पावन धारा के समीप उनकी सहज उपस्थिति और उनके साथ हुई आत्मीय बातचीत आज मन को बार-बार उन्हीं क्षणों की ओर ले जाती है। गंगा तट पर बिताए वे पल अब परमार्थ परिवार के लिए केवल स्मृतियाँ नहीं, बल्कि एक अमूल्य भाव-संपदा हैं।

आज वे हमारे बीच देह रूप में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा निभाए गए चरित्र, उनकी कला की गूँज, उनके सामाजिक कार्य और उनसे जुड़ी अनगिनत स्मृतियाँ उन्हें लंबे समय तक हमारे बीच जीवंत रखेंगी। नाना पाटेकर जी का जाना भारतीय कला-जगत में एक ऐसी रिक्तता छोड़ गया है, जिसे भर पाना संभव नहीं। लेकिन उन्होंने जो विरासत छोड़ी है, वह सदैव हमारे साथ रहेगी।

माँ गंगा से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा उनके परिवारजनों, प्रियजनों और असंख्य प्रशंसकों को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति, धैर्य और संबल प्रदान करें।

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