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परमार्थ निकेतन में सर्वपितृ अमावस्या पर विशेष पूजन-अर्चन*
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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस*
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भारतीय ऋषि परम्परा-जहाँ मन की शान्ति, आत्मबोध और जीवन का संतुलन ही साधना थी*
ऋषिकेश, 10 अक्टूबर। सर्वपितृ अमावस्या भारतीय सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और भावपूर्ण पर्व है। अपने पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और विशेष पूजन-अर्चन का दिन है। अपनी जड़ों, अपने संस्कारों और अपनी जीवन परम्परा से जुड़ने का अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि हम अकेले नहीं हैं, हमारे अस्तित्व में हमारे पूर्वजों का तप, त्याग, संस्कार, आशीर्वाद और जीवन का अनुभव समाहित हैं।
आज विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस हमें एक महत्वपूर्ण सत्य का संदेश देता है कि जिस प्रकार शरीर का स्वास्थ्य आवश्यक है, उसी प्रकार मन की शान्ति, भावनात्मक संतुलन और आत्मिक प्रसन्नता भी जीवन के लिए अनिवार्य हैं।
हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व जीवन को ऐसा अनुशासन, ऐसी साधना और ऐसे संस्कार दिए, जिनमें मन को स्थिर रखने, भावनाओं को समझने, तनाव से उबरने और जीवन में संतुलन स्थापित करने के अनेक मार्ग निहित थे।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि सर्वपितृ अमावस्या भारतीय जीवन-दर्शन को समझने का एक सुंदर अवसर है। जब हम अपने पितरों का स्मरण करते हैं, उनके निमित्त तर्पण करते हैं, अन्नदान करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, तब हम अपने जीवन में संबंधों, स्मृतियों और संस्कारों के महत्व को भी स्वीकार करते हैं। कृतज्ञता का यह भाव हमें अपने अतीत से जोड़ता है और वर्तमान जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बनाने की प्रेरणा देता है।
आज जब विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर पूरी दुनिया मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संकल्प ले रही है, तब हमारी ऋषि परम्परा का जीवन-दर्शन अत्यंत प्रासंगिक है।
हमारे ऋषियों ने मन को समझने और साधने के लिए ध्यान, प्राणायाम, योग, मंत्र-जप, स्वाध्याय, सत्संग, मौन, सेवा और प्रकृति के सान्निध्य जैसे अनेक मार्ग विकसित किए। योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने योग को “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” कहा है, अर्थात् चित्त की वृत्तियों को समझते हुए उन्हें संयमित और स्थिर करने की साधना। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी मन की चंचलता को स्वीकार करते हुए अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से उसे साधने का मार्ग बताया है।
हमारी ऋषि परम्परा में प्रकृति भी जीवन और मन के संतुलन की महत्वपूर्ण सहचरी रही है। नदियों के तट पर ध्यान, वृक्षों के नीचे साधना, प्रातःकालीन सूर्य के दर्शन, मंत्रों का उच्चारण और सामूहिक प्रार्थना जीवन को एक लय प्रदान करते थे। आज भी प्रकृति के बीच समय बिताना, नियमित दिनचर्या अपनाना, योग करना और आत्मीय संबंधों को मजबूत बनाना मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल में सहायक हो सकता है।
हमारे आश्रमों, गुरुकुलों और परिवारों में प्रार्थना, अनुशासन, सामूहिक जीवन, गुरुजनों का मार्गदर्शन तथा सेवा की परम्पराओं का विशेष महत्व रहा है। इन परम्पराओं में व्यक्ति को अकेले अपने संघर्षों से जूझने के बजाय समुदाय, परिवार और मार्गदर्शकों का सहारा मिलता था। जीवन में उद्देश्य, अपनत्व और आत्मविश्वास का यह भाव आज भी महत्वपूर्ण है।
योग और ध्यान मानसिक स्वास्थ्य के सहयोगी साधन हैं, लेकिन जब किसी व्यक्ति को लंबे समय तक अवसाद, अत्यधिक चिंता, अनिद्रा या अन्य मानसिक कठिनाइयों का सामना करना पड़े, तब मनोवैज्ञानिक परामर्श और आवश्यक चिकित्सकीय सहायता लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सहायता लेना कमजोरी नहीं, बल्कि स्वयं के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी है।
आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने भीतर कृतज्ञता, करुणा और शान्ति का दीप प्रज्वलित करें तथा समाज में ऐसा वातावरण बनाएँ, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को सुना जाए, समझा जाए और सम्मान मिले।
क्योंकि सनातन संस्कृति का वास्तविक संदेश केवल आत्मकल्याण नहीं, बल्कि सर्वकल्याण है। जब मन में शान्ति, परिवार में संवेदना, समाज में सहयोग और जीवन में साधना होती है, तभी स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ परिवार और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण होता है।
सर्वपितृ अमावस्या पर समस्त पितरों को श्रद्धापूर्ण नमन। माँ गंगा और परमात्मा से प्रार्थना है कि सभी के जीवन में शान्ति, सद्बुद्धि, स्वास्थ्य और सद्भाव का प्रकाश बना रहे।
