हरियाली अमावस्या – प्रकृति में परमात्मा के दर्शन
एक संकल्प-हरित भविष्य का
प्रकृति का पूजन करें, पौधा लगाएँ और आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती को हरा-भरा बनाएँ
जागृत युवा शक्ति ही विश्व की नई दिशा, नई ऊर्जा और नई आशा है
ऋषिकेश, 12 अ्रगस्त। हरियाली अमावस्या भारतीय सनातन संस्कृति में प्रकृति, पर्यावरण और आध्यात्मिक चेतना के अद्भुत समन्वय का पर्व है। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, धरती के संरक्षण का संकल्प लेने और जीवन के मूल स्रोतों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने का पावन अवसर है। हरियाली अमावस्या हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति केवल हमारे जीवन का आधार नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा की जीवंत अभिव्यक्ति है।
आज अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि युवा चेतना से विश्व परिवर्तन। युवा केवल उम्र नहीं, ऊर्जा, साहस, संकल्प और परिवर्तन की प्रखर चेतना का है। युवा मन में सपने हों, हृदय में करुणा हो, कर्म में सेवा हो और जीवन में संस्कार हों, तो वही युवा राष्ट्र और विश्व की दिशा बदल सकता है।
जब युवा अपनी शक्ति को सेवा, संस्कार, राष्ट्रनिर्माण, पर्यावरण संरक्षण और मानवता के कल्याण के लिए समर्पित करते हैं, तब केवल भविष्य नहीं बनता बल्कि इतिहास रचा जाता है। आइए, युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दें और उन्हें अपने भीतर की शक्ति पहचानने के लिए प्रेरित करें। जागृत युवा शक्ति ही विश्व की नई दिशा, नई ऊर्जा और नई आशा है।
परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में हरियाली अमावस्या के पावन अवसर पर प्रकृति संरक्षण, वृक्षारोपण और पर्यावरणीय जागरूकता का संदेश देते हुए सभी से आह्वान किया कि इस पावन पर्व को केवल पूजा और परंपरा के साथ इसे धरती के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन का अवसर बनाएँ।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को पूजनीय माना है। हमारे लिए वृक्ष, जीवनदाता हैं। नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति हैं। पर्वत केवल पत्थरों के समूह नहीं, बल्कि हमारी आध्यात्मिक चेतना के प्रहरी हैं। उन्होंने कहा कि “प्रकृति में परमात्मा के दर्शन” का भाव हमारी सनातन संस्कृति की मूल चेतना है। जब हम वृक्ष लगाते हैं, जल बचाते हैं, नदियों को स्वच्छ रखते हैं और धरती को प्रदूषण से मुक्त करने का प्रयास करते हैं, तब वास्तव में हम ईश्वर की सृष्टि की सेवा करते हैं।
उन्होंने कहा कि आज जब जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण, जल संकट, घटते वन क्षेत्र और जैव विविधता का संरक्षण वैश्विक चुनौतियाँ बन चुके हैं, तब हरियाली अमावस्या जैसे पर्वों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। यह पर्व हमें केवल प्रकृति की हरियाली देखने का नहीं, बल्कि अपने भीतर भी पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की हरियाली विकसित करने का संदेश देता है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि पौधे लगाना एक सुंदर भविष्य की नींव रखने जैसा है। आज अगर हम पौधों का रोपण करते हैं तो वह कल आने वाली पीढ़ियों को छाया देगा, प्राणवायु देगा है, पक्षियों और जीव-जंतुओं को आश्रय देगा और इससे मिट्टी का संरक्षण होगा।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में पीपल, वट, नीम, तुलसी, बेल, आंवला आदि वृक्षों और वनस्पतियों को धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व दिया गया है। हरियाली अमावस्या का पर्व हमें संदेश देती है कि पर्यावरण संरक्षण हमारा व्यक्तिगत धर्म और सामाजिक कर्तव्य है। हम अपने घरों, विद्यालयों, कार्यालयों और आसपास के क्षेत्रों में पौधे लगाकर, जल का संरक्षण करके, सिंगल यूज प्लास्टिक का कम उपयोग करके, कचरे का उचित प्रबंधन करके और नदियों-तालाबों को स्वच्छ रखकर पर्यावरण संरक्षण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
हरियाली अमावस्या के अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने सभी से आह्वान करते हुये कहा कि एक पौधा अपनी धरती मां के नाम अवश्य लगाएँ और उसे केवल रोपित ही न करें, बल्कि अपने परिवार के सदस्य की तरह उसका संरक्षण भी करें। पौधा लगाना पहला कदम है; उसे जीवित रखना, सींचना और वृक्ष बनते तक उसकी देखभाल करना वास्तविक पर्यावरण सेवा है।
यह पर्व हमें एक ऐसा संकल्प लेने का अवसर देता है जो केवल आज के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए है, धरती हरी होगी तो जीवन खुशहाल होगा; नदियाँ स्वच्छ होंगी तो सभ्यता सुरक्षित होगी; जंगल सुरक्षित होंगे तो भविष्य सुरक्षित होगा।

हरियाली अमावस्या पर आइए, प्रकृति को नमन करें, धरती माँ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें और धरती को हरा-भरा बनाएँ रखने का संकल्प लें।
