वसन्त पंचमी के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में माँ सरस्वती जी का पूजन-अर्चन*

*विशेष यज्ञ कर विश्व शान्ति की प्रार्थना*

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती, पराक्रम दिवस पर परमार्थ निकेतन से उनकी साधना व राष्ट्रभक्ति को नमन*

परमार्थ गुरूकुल के आचार्यो और ऋषिकुमारों ने किया वेदमंत्रों से माँ सरस्वती जी का पूजन*

परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने वसन्तोत्सव पर योग के साथ प्रस्तुत किये सांस्कृतिक कार्यक्रम*

मन भी वसन्त के समान है, जब उसमें सकारात्मक विचार, सेवा की भावना और आध्यात्मिक चेतना का संचार होता है, तो जीवन स्वतः ही पुष्पित-पल्लवित हो उठता है*

स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में वसन्त पंचमी का पावन पर्व अत्यन्त श्रद्धा, भक्ति और दिव्यता के साथ मनाया गया। इस शुभ अवसर पर विद्या, बुद्धि, वाणी और विवेक की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती जी का विधिवत पूजन-अर्चन किया तथा विशेष यज्ञ के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व में शान्ति, सद्भाव और कल्याण की प्रार्थना की गई।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती, पराक्रम दिवस पर परमार्थ निकेतन से उनकी साधना व राष्ट्रभक्ति को नमन। नेताजी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे महानायक थे जिनका जीवन अदम्य साहस, अपराजेय आत्मबल और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने पराधीनता की जंजीरों को तोड़ने के लिए निर्भीक नेतृत्व प्रदान किया और “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” जैसे उद्घोष से सम्पूर्ण राष्ट्र में क्रांति की चेतना जागृत की। ऐसे महापुरूष की साधना को नमन।

नेताजी का पराक्रम केवल रणभूमि तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके विचार, त्याग और राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पण करने की भावना में भी प्रकट होता है। आज भी उनका जीवन हमें साहस, बलिदान, अनुशासन और राष्ट्रीय एकता के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देता है। पराक्रम दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि सशक्त, आत्मनिर्भर और एकजुट भारत के निर्माण में नेताजी का संदेश सदैव मार्गदर्शक रहेगा।

परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि वसन्त पंचमी, जीवन में नये उल्लास, नयी चेतना और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है। वसन्त तो ऋतुराज है, वह ऋतु जो प्रकृति को नवजीवन देता है, पुष्पों में रंग भर देता है और मन को भी सृजन, करुणा एवं आनंद की ओर प्रेरित करता है। इस दिन माँ सरस्वती जी का प्राकट्य हुआ था, जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता हैंमाँ सरस्वती श्वेत वस्त्र, श्वेत कमल और वीणा धारण करती हैं, ये सभी पवित्रता, शान्ति और संतुलन के प्रतीक हैं। आज के अशांत और तनावग्रस्त युग में माँ सरस्वती जी का यह संदेश अत्यन्त प्रासंगिक है कि ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित न हो, बल्कि वह जीवन को सुन्दर, सरल और संवेदनशील बनाने का माध्यम बने।

वसन्त का आगमन प्रकृति और संस्कृति के गहरे संबंध का प्रतीक है। खेतों में लहलहाती फसलें, आम के बौर, सरसों के पीले फूल, ये सभी जीवन में आशा और समृद्धि का संकेत देते हैं। भारतीय संस्कृति सदैव प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीने की शिक्षा देती रही है। वसन्त पंचमी इसी सनातन दृष्टि को स्मरण कराने का पर्व है, जहाँ मानव स्वयं को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग मानता है।

इस अवसर पर सम्पन्न विशेष यज्ञ का उद्देश्य व्यक्तिगत कल्याण के साथ ‘वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के साथ सम्पूर्ण विश्व के लिए शान्ति की कामना है।

वसन्त पंचमी विद्यारम्भ, कला-साधना और ज्ञान की उपासना के लिए अत्यन्त शुभ है। परमार्थ निकेतन में उपस्थित श्रद्धालुओं, साधकों और विद्यार्थियों ने माँ सरस्वती जी का पूजन कर बौद्धिक ज्ञान, विवेक, विनम्रता और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रार्थन की।

स्वामी जी ने कहा कि मन भी वसन्त के समान है, जब उसमें सकारात्मक विचार, सेवा की भावना और आध्यात्मिक चेतना का संचार होता है, तो जीवन स्वतः ही पुष्पित-पल्लवित हो उठता है। सनातन संस्कृति हमें संदेश देती है कि बाह्य उन्नति के साथ-साथ आन्तरिक शान्ति और संतुलन भी अनिवार्य है। माँ सरस्वती जी की आराधना वास्तव में उसी आन्तरिक यात्रा का आरम्भ है।

वसन्त पंचमी पर माँ सरस्वती जी का पूजन, यज्ञ और सामूहिक प्रार्थना सनातन संस्कृति की उस शाश्वत परम्परा को सजीव करती है, जो ज्ञान, करुणा और शान्ति को जीवन का आधार मानती है। वसन्त का यह उत्सव हमें स्मरण कराता है कि जब हमारा मन ज्ञानरूपी प्रकाश से आलोकित होता है, तभी समाज और राष्ट्र में सद्भाव पनपता है। माँ सरस्वती जी की कृपा से मानवता अज्ञान, हिंसा और वैमनस्य से मुक्त होकर सत्य, सौहार्द और शान्ति के पथ पर अग्रसर हो, यही इस पावन पर्व का सार और संदेश है।

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