-परमार्थ निकेतन परिवार ने वेदमंत्रों, शंखध्वनि और पुष्पवर्षा कर किया भव्य व दिव्य अभिनन्दन
-परम पूज्य गुरूदेव का सान्निध्य पाकर गद्गद हुये नन्हे – नन्हे ऋषिकुमार
-हिन्दी दिवस के अवसर पर विश्व विख्यात गंगा आरती के माध्यम से हिन्दी को दिल से आत्मसात करने का दिया संदेश
ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन का वातावरण अत्यंत दिव्य और मंगलमय हो उठा, जब पांच सप्ताह की विदेश यात्रा के पश्चात परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलायंस की अंतरराष्ट्रीय महासचिव, साध्वी भगवती सरस्वती जी परमार्थ निकेतन पधारे।
परमार्थ निकेतन परिवार ने वेदमंत्रों की गूंज, शंखध्वनि की पवित्रता और पुष्पवर्षा की सुगंध से वातावरण को आध्यात्मिकता से युक्त कर दिया। पूज्य स्वामी जी और साध्वी जी के अभिनन्दन के इन दिव्य क्षणों में नन्हे-नन्हे ऋषिकुमार आनंद और कृतज्ञता से अभिभूत हो उठे। पूज्य स्वामी जी का सान्निध्य पाकर उनका हृदय गद्गद हो गया।
आज हिन्दी दिवस को भी परमार्थ निकेतन ने दिव्यता और गर्व के साथ मनाया। विश्वविख्यात गंगा आरती के माध्यम से हिन्दी के महत्व का संदेश पूरे विश्व को दिया गया। आरती के प्रत्येक मंत्र, भजन और प्रार्थना ने यह उद्घोष किया कि हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारी आत्मा और हमारी पहचान की अभिव्यक्ति है। स्वामी जी ने संदेश दिया कि “हिन्दी वह सेतु है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है। आधुनिक युग में भले ही हम वैश्विक भाषाओं से जुड़े, पर अपनी हिन्दी से दूरी हमें अपनी आत्मा से दूर कर देगी।”
वर्तमान समय में जब दुनिया वैश्वीकरण की ओर तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को हर क्षेत्र में दक्ष बनाना है। निश्चित ही अंग्रेजी और अन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं का ज्ञान उन्हें वैश्विक मंच पर ले जाएगा, परंतु यदि हमने उन्हें हिन्दी और संस्कृत से नहीं जोड़ा, तो वे अपनी जड़ों से कट जाएँगे।
हिन्दी और संस्कृत केवल भाषाएँ नहीं, बल्कि हमारे संस्कार, मूल्य और सांस्कृतिक चेतना की धरोहर हैं। इन भाषाओं में रचित साहित्य, वेद, उपनिषद, शास्त्र और कविताएँ हमारी आत्मा की आवाज हैं। यदि नई पीढ़ी को केवल अनुवाद या किसी व्याख्याकार की नजर से साहित्य मिलेगा, तो वे मूल रस, गहराई और आत्मा से वंचित रहेंगे।
हमें बच्चों को विश्व भाषाएँ सिखानी ही चाहिए, परंतु अपनी मातृभाषा से दूर करना सबसे बड़ी भूल होगी। जो अपनी भाषा और साहित्य को नहीं समझ पाते, वे धीरे-धीरे अपनी जीवनदृष्टि और संस्कारों से भी दूर हो जाते हैं।
अतः आज आवश्यकता है कि हम गर्व से हिन्दी बोलें, संस्कृत के ज्ञान को जीवन में उतारें और आने वाली पीढ़ी को यह धरोहर सौंपें। यही उन्हें अपनी जड़ों से जोड़कर सशक्त, संस्कारित और आत्मनिर्भर बनाएगा।
साध्वी भगवती सरस्वती जी ने लगभग 30 वर्ष पूर्व भारत आगमन के पश्चात हिन्दी सीखने की अपनी अद्भुत यात्रा साझा की। उन्होंने बताया कि जब वे पहली बार अमेरिका से भारत आईं, तब हिन्दी उनके लिए एक नई भाषा थी परन्तु माँ गंगा के तट पर जीवन बिताते हुए, परमार्थ परिवार और ऋषिकुमारों के सान्निध्य में उन्होंने धीरे-धीरे हिन्दी को आत्मसात किया।
साध्वी जी ने कहा कि हिन्दी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, भावनाओं और आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति है। आज वे न केवल हिन्दी बोलती हैं, बल्कि उसे अपने हृदय की भाषा मानकर विश्वभर में संदेश देती हैं। हिन्दी की मधुरता, उसकी आत्मीयता और उसका अपनापन ही उसे अद्वितीय बनाता है।
विश्वभर में आयोजित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में स्वामी जी और साध्वी जी अनेक मंचों पर हिन्दी में भारतीय संस्कृति, योग, ध्यान, गंगा संरक्षण और वसुधैव कुटुम्बकम् के संदेश को प्रभावशाली ढंग से रखते हैं। उनके विचारों ने विश्व के अनेक देशों में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और सनातन संस्कृति के प्रति नई चेतना जगाई।
परमार्थ निकेतन में गूँजते वेदमंत्रों और गंगा जी की आरती की दिव्य लहरियाँ यह संदेश देती है कि चाहे हम कहीं भी जाएँ, किसी भी भाषा या संस्कृति से जुड़े हों, हमारी असली पहचान हमारी सनातन परंपरा और हमारी मातृभाषा में ही निहित है।

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