माँ शबरी जयंती की परमार्थ निकेतन से अनेकानेक शुभकामनायें*
माँ शबरी, सनातन संस्कृति में भक्ति की सर्वाेच्च परिभाषा*
माँ शबरी की भक्ति की पराकाष्ठा, न वैभव, न विद्या, केवल अथाह प्रेम का सागर*
स्वामी चिदानन्द सरस्वती*
ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन से आज माँ शबरी जयंती के पावन अवसर पर भावभीनी श्रद्धाजंलि अर्पित की। इस दिव्य अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने संदेश में कहा कि अद्भुत है माँ शबरी की भक्ति की पराकाष्ठा, न वैभव, न विद्या, केवल अथाह प्रेम का सागर है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि निष्कलुष हृदय, अटूट श्रद्धा और पूर्ण समर्पण से प्रशस्त होता है। माँ शबरी, सनातन संस्कृति में भक्ति की सर्वाेच्च परिभाषा है।
माँ शबरी आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध थीं। उन्होंने अपने गुरु मतंग ऋषि के वचनों को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया। गुरु ने कहा था “प्रभु श्रीराम तुम्हारे आश्रम अवश्य आएंगे।” बस यही विश्वास उनकी साधना बन गया। वर्षों की प्रतीक्षा उनके लिए तपस्या बनी, तितिक्षा उनकी शक्ति बनी और समर्पण उनकी आराधना बन गया। प्रत्येक दिन वे उसी प्रेम से पथ बुहारतीं, पुष्प सजातीं और आश्रम को ऐसे संवारतीं मानो आज ही प्रभु पधारेंगे।
यह प्रतीक्षा साधारण प्रतीक्षा नहीं थी; यह धैर्य, विश्वास और अखंड आस्था का दिव्य उदाहरण थी। आज के युग में जहाँ क्षणिक परिणाम चाहता है, वहाँ शबरी का जीवन हमें संदेश देता है कि सच्ची भक्ति में समय का बंधन नहीं होता। भक्ति में अधीरता नहीं, धैर्य होता है; अपेक्षा नहीं, समर्पण होता है।
शास्त्रों में कहा गया है “भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।” अर्थात् केवल अनन्य भक्ति से ही परमात्मा की प्राप्ति संभव है। माँ शबरी ने इस सत्य को अपने जीवन से सिद्ध किया। जब प्रभु श्रीराम उनके आश्रम पहुँचे, तब उन्होंने प्रेमपूर्वक जूठे बेर अर्पित किए। यह बाह्य दृष्टि से साधारण घटना प्रतीत हो सकती है, परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह प्रेम की पराकाष्ठा थी। प्रभु ने उस प्रेम को स्वीकार किया, क्योंकि ईश्वर को वस्तु नहीं, भावना प्रिय होती है।
शबरी का प्रेम निष्कपट था, निर्मल था, पूर्णतः अहंकार रहित था। न उनमें ‘मैं’ था, न ‘मेरा’, केवल ‘राम’ थे। हर श्वास में राम नाम, हर कर्म में राम स्मरण और हर भावना में राम का ही वास था। यही सच्ची भक्ति, जहाँ साधक स्वयं को मिटाकर प्रभु में विलीन हो जाता है।
माँ शबरी की कथा आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। आधुनिक जीवन की दौड़, तनाव और स्पर्धा के बीच हम भक्ति की सरलता को भूलते जा रहे हैं। 
आज आवश्यकता है कि हम अपने जीवन में शबरी जैसी निष्ठा, धैर्य और समर्पण को स्थान दें। जब हमारा प्रत्येक कर्म सेवा बन जाए, प्रत्येक विचार प्रार्थना बन जाए और प्रत्येक श्वास राम नाम से ओतप्रोत हो जाए, तभी सच्ची आध्यात्मिक उन्नति संभव है।
