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परमार्थ निकेतन में ‘कला प्रवाह’ का भव्य एवं दिव्य समापन*
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परमार्थ गंगा तट पर भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का अनुपम संगमय सुर, साधना और संस्कृति से गुंजायमान हुई गंगा की पावन धरा*
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परमार्थ निकेतन से धनतेरस की अनंत शुभकामनायें*
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लोक परंपराएँ हमारी जड़ों से जुड़ने का माध्यम*
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भारत में संगीत एक साधना है*
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स्वामी चिदानन्द सरस्वती*
देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा, माँ गंगा के दिव्य तट परमार्थ निकेतन के आध्यात्मिक वातावरण में भारतीय कला, संगीत, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का अनुपम उत्सव ‘कला प्रवाह’ भव्य एवं गरिमामय रूप से सम्पन्न हुआ। संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली (संगीत, नृत्य एवं नाटक की राष्ट्रीय अकादमी), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की स्वायत्त संस्था तथा संस्कृति विभाग, उत्तराखंड सरकार के सहयोग से परमार्थ निकेतन के दिव्य प्रांगण में आयोजित इस सांस्कृतिक महोत्सव ने भारतीय संस्कृति की विविधता, समृद्धि और आध्यात्मिक गहराई को एक ही मंच पर साकार किया।
परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी तथा साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में आयोजित समापन समारोह में संस्कृति विभाग, उत्तराखंड सरकार के सचिव श्री युगल किशोर पंत एवं संगीत नाटक अकादमी की उपनिदेशक श्रीमती रीता स्वामी की गरिमामयी उपस्थिति रही। देश के विभिन्न प्रांतों से आए कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत, लोक चेतना और सनातन आध्यात्मिक परंपरा का मनोहारी दर्शन कराया।
इस अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत की संस्कृति हमारी पहचान है और हमारा स्वाभिमान भी है। यहाँ संगीत साधना है, नृत्य अभिव्यक्ति है, लोक परंपराएँ हमारी जड़ों से जुड़ने का माध्यम हैं और कला हृदयों को जोड़ने वाली दिव्य भाषा है। भारत की सांस्कृतिक विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक हमारी भाषाएँ, वेशभूषाएँ, लोकधुनें और कलाएँ भिन्न हो सकती हैं, लेकिन उन सबके हृदय में एकत्व, समरसता और वसुधैव कुटुम्बकम् का ही भाव प्रवाहित होता है ।
उन्होंने कहा कि माँ गंगा के पावन तट पर आयोजित ‘कला प्रवाह’ एक दिव्य सांस्कृतिक आयोजन है। जब कला में संस्कृति का भाव और संस्कृति में आध्यात्मिकता का स्पर्श जुड़ता है, तब वह भीतर संवेदना, करुणा, प्रेम और चेतना का जागरण करती है। हमारी सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है। इसे संरक्षित करना, संवर्धित करना और नई पीढ़ी तक पहुँचाना हम सभी का सामूहिक दायित्व है।
साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि कला वह सार्वभौमिक भाषा है, जो बिना किसी भेदभाव के हृदय से हृदय को जोड़ती है। संगीत और भक्ति हमें हमारी आंतरिक शांति और दिव्यता से जोड़ते हैं। भारत की प्रत्येक लोकधुन, प्रत्येक भजन और प्रत्येक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति में जीवन दर्शन, श्रद्धा और सामूहिक चेतना के सूत्र समाहित हैं। जब देश के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकार अपनी कला माँ गंगा के चरणों में अर्पित करते हैं, तब यह विविधता में एकता का जीवंत उत्सव बन जाता है।
समारोह में श्री युगल किशोर पंत ने भारतीय कला एवं संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए ऐसे आयोजनों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की सांस्कृतिक परंपराएँ हमारी अमूल्य धरोहर हैं। लोककलाओं, शास्त्रीय संगीत और पारंपरिक अभिव्यक्तियों को राष्ट्रीय मंच प्रदान करना कलाकारों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण प्रयास है।
श्रीमती रीता स्वामी ने संगीत नाटक अकादमी की भूमिका और भारतीय प्रदर्शनकारी कलाओं के संरक्षण, संवर्धन तथा कलाकारों को प्रोत्साहन देने के प्रयासों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी विशिष्ट पहचान है और विभिन्न क्षेत्रों की कला परंपराओं को एक मंच पर प्रस्तुत करना सांस्कृतिक संवाद एवं राष्ट्रीय एकात्मता को सशक्त बनाता है।
परमार्थ निकेतन में आयोजित ‘कला प्रवाह’ की प्रस्तुतियों में भारत के विभिन्न अंचलों की सांस्कृतिक सुगंध और आध्यात्मिक भावधारा विशेष रूप से देखने को मिली। तमिलनाडु से पधारीं श्रीमती सुचित्रा बालासुब्रमण्यम ने अपनी हरिकथा प्रस्तुति के माध्यम से कथा, संगीत, भक्ति और भारतीय दर्शन की अद्भुत परंपरा को जीवंत किया। ओडिशा की सुप्रसिद्ध गायिका श्रीमती स्निति मिश्रा ने भक्तिमय भजनों की भावपूर्ण प्रस्तुति से वातावरण को श्रद्धा और भक्ति के रस में सराबोर कर दिया। पश्चिम बंगाल के श्री कार्तिक दास बाउल ने अपनी विशिष्ट बाउल संगीत परंपरा के माध्यम से भारतीय लोक अध्यात्म, सहज प्रेम और मानवीय एकत्व का संदेश प्रस्तुत किया।
इन प्रस्तुतियों में कहीं भक्ति की मधुरता थी, कहीं लोकजीवन की सहजता, कहीं शास्त्रीय परंपराओं की गंभीरता तो कहीं आध्यात्मिक अनुभूति की गहराईयां है। यह एक ऐसी यात्रा है, जो भारत की गौरवशाली परंपराओं को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ते हुए भविष्य तक पहुँचाने का संकल्प देती है।
माँ गंगा के पावन तट और परमार्थ निकेतन के दिव्य आध्यात्मिक वातावरण में संगीत, संस्कृति, भक्ति और आत्मिक शांति की अविस्मरणीय अनुभूतियाँ संजोकर सभी अतिथिगण एवं कलाकार अपने-अपने घरों के लिए विदा हुए। हृदय में मधुर स्मृतियाँ, मन में आनंद और जीवन में नई ऊर्जा लेकर यह यात्रा पूर्ण हुई।

