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परमार्थ निकेतन में पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने श्रद्धालुओं को दिया तीर्थाटन एवं तीर्थसेवन का संदेश*
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ऋषियों की तपस्या, नदियों की पवित्रता, प्रकृति की दिव्यता और भारतीय संस्कृति के जीवनमूल्यों से जुड़ने का माध्यम हैं तीर्थ*
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तीर्थाटन के साथ तीर्थसेवन भी आवश्यक*
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तीर्थों की स्वच्छता, पवित्रता, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हम सभी का सामूहिक दायित्व*
ऋषिकेश, 22 अक्टूबर। परमार्थ निकेतन आये श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश देते हुए परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने तीर्थाटन एवं तीर्थसेवन की भारतीय परंपरा के वास्तविक स्वरूप, महिमा और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर दिव्य संदेश दिया। उन्होंने कहा कि तीर्थ यात्रा भारतीय संस्कृति की एक ऐसी अनुपम परंपरा है, जो हमें अपनी जड़ों, अपने संस्कारों, प्रकृति और अपने अंतर्मन से जोड़ती है। तीर्थ जाना जितना महत्त्वपूर्ण है, तीर्थ के भाव को अपने जीवन में उतारना और तीर्थों की सेवा करना भी उतना ही आवश्यक है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि तीर्थ का अर्थ केवल किसी प्रसिद्ध मंदिर, नदी, पर्वत या धार्मिक स्थल तक पहुँचना नहीं है। तीर्थ वह पवित्र माध्यम है, जो हमारे जीवन की अशांति से शांति की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और स्वार्थ से सेवा की ओर ले जाने का दिव्य माध्यम है। भारतीय ऋषियों ने जिन स्थानों पर तपस्या की, साधना की, ज्ञान का प्रकाश दिया और मानवता को जीवन जीने की दिशा दी, वे स्थान कालांतर में श्रद्धा, साधना और आत्मचिंतन के केंद्र बने। इन स्थलों की महिमा उनकी प्राकृतिक सुंदरता या ऐतिहासिक पहचान तक सीमित नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक परंपराओं और लोककल्याण की भावना में निहित है।
उन्होंने कहा कि ‘तीर्थ’ शब्द अपने भीतर पार उतरने का गहन भाव समेटे हुए है। जिस प्रकार नदी का घाट एक तट से दूसरे तट तक जाने का माध्यम बनता है, उसी प्रकार तीर्थ जीवन की सीमाओं, विकारों और भ्रमों से ऊपर उठकर विवेक, करुणा, संयम और आत्मबोध की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। तीर्थ का वास्तविक लाभ तब मिलता है, जब वहाँ से लौटने के बाद हमारे विचारों में पवित्रता, व्यवहार में विनम्रता और कर्मों में सेवा का भाव हो।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि तीर्थाटन और तीर्थसेवन के बीच का अंतर समझना आज के समय की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। तीर्थाटन हमें तीर्थ तक ले जाता है, जबकि तीर्थसेवन हमें तीर्थ के आदर्शों से जोड़ता है। तीर्थाटन में हम पवित्र स्थलों के दर्शन करते हैं, तीर्थसेवन में हम उन स्थलों की पवित्रता, स्वच्छता, गरिमा और प्राकृतिक संपदा की रक्षा का संकल्प लेते हैं। तीर्थों ने पीढ़ियों को जोड़ा, विविधताओं को एक सूत्र में पिरोया और भारत की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया। 
उन्होंने आह्वान किया कि प्रत्येक श्रद्धालु तीर्थयात्रा के दौरान स्वच्छता का पालन करे, नदियों में कचरा न डाले, प्लास्टिक के उपयोग को कम करे, स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करे तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में योगदान दे। आज की तेज गति वाली जिंदगी, डिजिटल व्यस्तताओं और प्रतिस्पर्धा के बीच तीर्थ हमें ठहरकर स्वयं से संवाद करने का अवसर देते हैं।
उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे तीर्थों में श्रद्धा के साथ आएँ, सेवा का संकल्प लेकर लौटें। तीर्थों परम्परा की रक्षा करना हमारी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना है। तीर्थ की यात्रा तब पूर्ण होती है, जब तीर्थ का प्रकाश हमारे भीतर जागे।

